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नई दिशा।

अब यह दिशा बदलनी होगी.... संसद में हुड़दंग कर रहे, तन से,मन से लोभी, ऊपर खादी का लिबास, औ' भीतर नेता ढोंगी। अब यह दिशा बदलनी होगी... योग भक्ति से नाता तोड़े, बनकर फिरता जोगी, धर्म बेचता बन व्यापारी, सन्त हो गया भोगी। अब यह दिशा बदलनी होगी.... जर्जर नौका भी,अपनी मंजिल तक पहुचेगी टूटे    पतवारों     से, नैया पार नही होगी। अब यह दिशा बदलनी होगी....      ©दुर्गेश सिंह